मध्य पूर्व में शांति की बातें सिर्फ कागजों और बड़े होटलों के बंद कमरों तक सीमित रह गई हैं। हकीकत तो यह है कि लेबनान की धरती पर बिछी लाशें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। जिस वक्त अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे किसी समझौते की सुगबुगाहट तेज हो रही है, ठीक उसी समय इजरायली फाइटर जेट्स ने लेबनान पर भारी बमबारी की है। इस ताजा हमले में 3 लोगों की जान चली गई। यह महज़ एक हमला नहीं है, बल्कि उस डिप्लोमैटिक खेल का हिस्सा है जहां बंदूक की नोक पर शर्तें तय की जाती हैं।
इजरायल का संदेश साफ है। वह किसी भी ऐसी बातचीत को सफल नहीं होने देना चाहता जो उसकी सुरक्षा शर्तों को नजरअंदाज करती हो। लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाना इजरायल के लिए अब रोजमर्रा का काम बन गया है, लेकिन टाइमिंग ही सब कुछ है। जब दुनिया को लगता है कि तनाव कम हो रहा है, तभी अचानक धमाके गूँज उठते हैं।
लेबनान की सीमा पर जलती आग और कूटनीति का दोहरा चेहरा
इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान के रिहायशी इलाकों के करीब जिस तरह से हमला किया, वह डराने वाला है। मरने वाले 3 लोग कौन थे? क्या वे सीधे तौर पर हिजबुल्लाह से जुड़े थे या बस गलत वक्त पर गलत जगह मौजूद नागरिक थे? युद्ध में अक्सर यह फर्क मिटा दिया जाता है। इजरायल का दावा है कि उसने हथियार डिपो और कमांड सेंटर्स को तबाह किया है। लेकिन जमीनी सच यह है कि लेबनान की संप्रभुता के परखच्चे उड़ रहे हैं।
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का मतलब है कि तेहरान अपने प्रॉक्सी नेटवर्क को थोड़ा ढीला छोड़ सकता है। इजरायल को यही बात खटकती है। उसे लगता है कि अगर ईरान को प्रतिबंधों में ढील मिली, तो वह पैसा वापस लेबनान और गाजा में पहुंचेगा। इसलिए, वह बातचीत की मेज पर बैठने से पहले अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। वह चाहता है कि ईरान यह समझ ले कि समझौते के बावजूद इजरायल की कार्रवाई नहीं रुकेगी।
हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच छिड़ा नया मनोवैज्ञानिक युद्ध
यह सिर्फ मिसाइलों की लड़ाई नहीं रही। यह दिमाग की जंग है। हिजबुल्लाह के पास हजारों रॉकेट हैं, जो इजरायल के भीतर तक तबाही मचा सकते हैं। लेकिन वे भी संभलकर चल रहे हैं। वे जानते हैं कि एक बड़ी गलती पूरे लेबनान को गाजा बना सकती है। इजरायल इसी डर का फायदा उठा रहा है। वह छोटे-छोटे लेकिन सटीक हमले करके हिजबुल्लाह की सप्लाई लाइन काट रहा है।
पिछले कुछ हफ्तों में लेबनान के भीतर इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद का जाल और गहरा हुआ है। ताजा हमले में जिस तरह से टारगेट को चुना गया, वह बताता है कि इजरायल के पास सटीक इनपुट थे। जब आप किसी दुश्मन के घर में घुसकर उसे मारते हैं, तो आप सिर्फ उसे नहीं मारते, बल्कि उसके पूरे संगठन के मनोबल को तोड़ देते हैं। लेबनान सरकार सिर्फ बयानबाजी तक सीमित है क्योंकि उसके पास इजरायली वायुसेना को रोकने की ताकत नहीं है।
ईरान का इस पूरे मामले में क्या स्टैंड है
ईरान के लिए लेबनान उसका सबसे मजबूत किला है। अगर लेबनान में हिजबुल्लाह कमजोर होता है, तो ईरान का प्रभाव भूमध्य सागर तक खत्म हो जाएगा। अमेरिका के साथ बातचीत करते समय ईरान के हाथ थोड़े बंधे हुए हैं। वह सीधे तौर पर इजरायल से नहीं उलझना चाहता, लेकिन वह अपने सबसे वफादार साथी को अकेला भी नहीं छोड़ सकता।
यही वह पेच है जिसे इजरायल सुलझाना (या उलझाना) चाहता है। इजरायल को डर है कि जो बाइडन प्रशासन चुनाव से पहले कोई बड़ी डील कर लेगा, जिससे इजरायल के हाथ बंध जाएंगे। इसलिए नेतन्याहू सरकार "फैक्ट्स ऑन द ग्राउंड" बनाने में जुटी है। यानी बातचीत पूरी होने से पहले इतना नुकसान कर दो कि टेबल पर शर्तें तुम्हारी चलें।
मध्य पूर्व में शांति की उम्मीद कितनी जायज है
ईमानदारी से कहूँ तो, अभी शांति कोसों दूर है। जब तक इजरायल को यह नहीं लगता कि उसकी उत्तरी सीमा पूरी तरह सुरक्षित है, वह लेबनान पर हमले बंद नहीं करेगा। लेबनान के आम लोग इस भू-राजनीतिक शतरंज के मोहरे बन गए हैं। एक तरफ ईरान की महत्वाकांक्षा है, दूसरी तरफ इजरायल की सुरक्षा की जिद और बीच में पिस रहा है बेरूत।
अमेरिका की भूमिका यहाँ सबसे ज्यादा संदिग्ध है। वह एक तरफ शांति की अपील करता है और दूसरी तरफ इजरायल को वही बम सप्लाई करता है जो लेबनान पर गिर रहे हैं। यह दोहरापन ही इस संघर्ष को खत्म होने से रोक रहा है। अगर आप सोच रहे हैं कि अमेरिका-ईरान वार्ता से कल सुबह लेबनान में शांति हो जाएगी, तो आप गलत हैं। यह संघर्ष अभी और गहराने वाला है।
जमीनी हकीकत और आगे का रास्ता
लेबनान की अर्थव्यवस्था पहले से ही वेंटिलेटर पर है। ऊपर से ये हमले देश को दशकों पीछे धकेल रहे हैं। दक्षिण लेबनान के लोग अपने घरों को छोड़कर भाग रहे हैं। इजरायल ने चेतावनी दी है कि वे लिटानी नदी के उत्तर की ओर चले जाएं। यह संकेत है कि एक बड़ा जमीनी हमला भी हो सकता है।
अगर आप इस स्थिति को करीब से देख रहे हैं, तो आपको कुछ चीजों पर नजर रखनी चाहिए। पहली, क्या हिजबुल्लाह अपनी रणनीति बदलता है और इजरायल के बड़े शहरों को निशाना बनाता है? दूसरी, क्या अमेरिका ईरान पर दबाव डालने में कामयाब होता है कि वह हिजबुल्लाह को पीछे हटाए? और तीसरी, क्या इजरायल के भीतर की राजनीति नेतन्याहू को इस युद्ध को और खींचने की इजाजत देती है?
अभी के लिए, सबसे जरूरी यह है कि आप केवल हेडलाइंस पर भरोसा न करें। युद्ध की खबरें अक्सर आधी-अधूरी होती हैं। लेबनान पर हुआ यह हमला उस बड़े ज्वालामुखी का हिस्सा है जो कभी भी फट सकता है।
दक्षिण लेबनान के निवासियों के लिए फिलहाल सुरक्षा ही प्राथमिकता होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस और लेबनानी सेना के अपडेट्स को फॉलो करना उन लोगों के लिए अनिवार्य है जो ग्राउंड जीरो के करीब हैं। इस क्षेत्र में डिप्लोमेसी अक्सर धमाकों के बाद शुरू होती है, इसलिए किसी भी शांति समझौते की खबर को तब तक सच न मानें जब तक कि सीमा पर गनफायर रुक न जाए।