पाकिस्तानी सेना ने दावा किया है कि उसने एक बड़े ऑपरेशन के दौरान 22 आतंकियों को मार गिराया है। सरकारी प्रेस रिलीज और स्थानीय मीडिया आउटलेट्स इसे एक "बड़ी कामयाबी" की तरह पेश कर रहे हैं। लेकिन क्या यह वाकई इतनी सीधी कहानी है? जब आप बॉर्डर पॉलिटिक्स और दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को करीब से देखते हैं, तो चीजें अक्सर वैसी नहीं होतीं जैसी सरकारी बयानों में दिखती हैं। पाकिस्तानी सेना (ISPR) की ओर से आए इस बयान ने एक बार फिर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के अशांत इलाकों की ओर सबका ध्यान खींच लिया है।
अक्सर ऐसे ऑपरेशंस के बाद बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। 22 आतंकियों का मारा जाना कोई छोटी बात नहीं है। यह ऑपरेशन इंटेलिजेंस इनपुट्स के आधार पर चलाया गया था। बताया जा रहा है कि आतंकी किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने की फिराक में थे। सेना ने भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद करने का भी दावा किया है। पर यहाँ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या इन आतंकियों का सफाया करने से ग्राउंड लेवल पर कोई बदलाव आएगा? या यह सिर्फ एक आंकड़ों का खेल है जो जनता का ध्यान भटकाने के लिए खेला जा रहा है?
पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई और जमीनी हकीकत
पाकिस्तानी सेना के मुताबिक, यह एनकाउंटर उन इलाकों में हुआ जहाँ आतंकी संगठन टीटीपी (Tehrik-i-Taliban Pakistan) और अन्य गुट सक्रिय हैं। सेना ने अपने बयान में कहा कि खुफिया जानकारी मिली थी कि कुछ आतंकी छिपे हुए हैं। इसके बाद घेराबंदी की गई और मुठभेड़ शुरू हुई। घंटों चली इस गोलीबारी में 22 आतंकी ढेर हो गए। सेना इसे अपनी बड़ी जीत मान रही है।
सच तो यह है कि पाकिस्तान पिछले कई दशकों से आतंकवाद की आग में खुद झुलस रहा है। जिस "भस्मासुर" को उसने खुद पाला, अब वही उसे डस रहा है। टीटीपी जैसे संगठन अब सीधे तौर पर पाकिस्तानी फौज को चुनौती दे रहे हैं। जब हम इन 22 आतंकियों की बात करते हैं, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि ये आतंकी आए कहाँ से? क्या ये वही लोग हैं जिन्हें कभी "एसेट" कहा जाता था? यह एक कड़वा सच है जिसे वहां की सरकार स्वीकार करने से बचती है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एनकाउंटर से समस्या हल नहीं होगी। जब तक आतंकियों की सप्लाई लाइन और उनकी विचारधारा पर प्रहार नहीं होगा, तब तक एक के बाद एक नए आतंकी पैदा होते रहेंगे। सेना कहती है कि उसने इलाका साफ कर दिया है। लेकिन स्थानीय लोग अक्सर कुछ और ही कहानी सुनाते हैं। कई बार इन ऑपरेशंस में आम नागरिकों के फंसे होने की खबरें भी आती हैं, जिन्हें दबा दिया जाता है।
आखिर क्यों बढ़ रही हैं आतंकी घटनाएं
पाकिस्तान में पिछले कुछ महीनों में आतंकी हमलों में अचानक तेजी आई है। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन है। तालिबान के आने के बाद टीटीपी को एक नई ऊर्जा मिली है। उन्हें लगता है कि वे भी पाकिस्तान में उसी तरह का शासन ला सकते हैं।
दूसरा कारण है आर्थिक अस्थिरता। जब देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है, तो अराजक तत्वों को पैर पसारने का मौका मिल जाता है। लोग बेरोजगारी और गरीबी की वजह से आसानी से इन गुटों के चंगुल में फंस जाते हैं। पाकिस्तानी सेना इन 22 आतंकियों को मारकर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन वह उस जड़ को नहीं काट पा रही जहाँ से ये आतंकी निकल रहे हैं।
- टीटीपी का बढ़ता प्रभाव और पाकिस्तानी ठिकानों पर हमले।
- बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलनों का हिंसक होना।
- सीमा पार से मिलने वाली कथित मदद।
- सुरक्षा बलों के पास सटीक सूचनाओं की कमी।
आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान का दोहरा मापदंड
दुनिया भर के रक्षा जानकार यह जानते हैं कि पाकिस्तान की आतंकवाद के प्रति नीति हमेशा से दोहरी रही है। वे "अच्छे आतंकी" और "बुरे आतंकी" के बीच फर्क करते आए हैं। जो आतंकी उनके पड़ोसियों (भारत और अफगानिस्तान) को परेशान करते हैं, वे उनके लिए अच्छे हैं। लेकिन जो खुद पाकिस्तान के अंदर धमाके करते हैं, वे बुरे बन जाते हैं।
22 आतंकियों का एनकाउंटर इसी विरोधाभास का हिस्सा लगता है। जब तक आप आतंकवाद को एक वैश्विक समस्या के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक कामयाबी अधूरी ही रहेगी। आप अपने घर में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सिर्फ पड़ोसी को काटेगा। आज वही सांप पाकिस्तानी सेना को डस रहे हैं। यह ऑपरेशन शायद कुछ वक्त के लिए शांति दे दे, पर यह लॉन्ग टर्म सॉल्यूशन नहीं है।
भारत हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान को अपनी धरती पर मौजूद आतंकी बुनियादी ढांचे को पूरी तरह नष्ट करना होगा। सिर्फ दिखावे के लिए कुछ आतंकियों को मार गिराने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भरोसा नहीं जीता जा सकता। आपको लश्कर और जैश जैसे संगठनों पर भी वैसी ही कार्रवाई करनी होगी जैसी आप टीटीपी पर कर रहे हैं।
क्या इस कामयाबी से सुरक्षा स्थिति सुधरेगी
अगर आप आंकड़ों को देखें, तो हर साल सैकड़ों आतंकी मारे जाते हैं। लेकिन क्या इससे पाकिस्तान सुरक्षित हुआ? जवाब है- नहीं। सुरक्षा स्थिति पहले से और ज्यादा खराब हुई है। खैबर पख्तूनख्वा के इलाकों में अब पुलिस भी जाने से डरती है। वहां सेना को मोर्चा संभालना पड़ रहा है।
22 आतंकियों के मारे जाने से निश्चित रूप से उस विशेष नेटवर्क को झटका लगा होगा। उनके कमांडर शायद अब अपनी रणनीति बदलें। लेकिन उनकी जगह लेने के लिए दर्जनों और तैयार बैठे हैं। असली कामयाबी तब होगी जब वहां के मदरसों और ट्रेनिंग कैंपों को बंद किया जाएगा। जब युवाओं को बंदूकों के बजाय किताबें दी जाएंगी। सेना का काम सीमा की रक्षा करना है, लेकिन पाकिस्तान में सेना ही सब कुछ तय करती है। यही सबसे बड़ी दिक्कत है।
भविष्य की चुनौतियां और सेना की रणनीति
आने वाले समय में पाकिस्तानी सेना के लिए चुनौतियां और बढ़ने वाली हैं। टीटीपी ने साफ कर दिया है कि वह पीछे हटने वाला नहीं है। वे अब आत्मघाती हमलों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में सिर्फ एनकाउंटर करना काफी नहीं होगा। सेना को अपनी पूरी इंटेलिजेंस मशीनरी को ओवरहाल करना पड़ेगा।
स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना भी उतना ही जरूरी है। बलूचिस्तान जैसे इलाकों में सेना के प्रति भारी नफरत है। वहां के लोग सेना को सुरक्षा बल नहीं, बल्कि कब्जा करने वाली ताकत के रूप में देखते हैं। जब तक यह नजरिया नहीं बदलेगा, आतंकियों को वहां पनाह मिलती रहेगी। सेना को अपनी ऑपरेशंस की पारदर्शिता बढ़ानी होगी।
इन 22 आतंकियों के एनकाउंटर को सोशल मीडिया पर काफी प्रमोट किया जा रहा है। इसका मकसद शायद गिरते हुए मोराल को उठाना है। सेना दिखाना चाहती है कि वह अभी भी कंट्रोल में है। पर हकीकत ये है कि पाकिस्तान के कई हिस्सों में सरकार का इकबाल खत्म हो चुका है। वहां आतंकियों का समानांतर शासन चलता है।
अगला कदम क्या होना चाहिए? सबसे पहले तो आतंकियों की फंडिंग रोकनी होगी। इसके बाद उन राजनीतिक दलों पर लगाम कसनी होगी जो वोट बैंक के लिए इन कट्टरपंथियों का समर्थन करते हैं। सेना को राजनीति से बाहर निकलकर विशुद्ध रूप से सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो 22 क्या, 2200 आतंकियों को मारने के बाद भी हालात जस के तस रहेंगे। अपनी नीति बदलिए, वरना अंजाम नहीं बदलेगा।
आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पाकिस्तान को अपनी विदेश और आंतरिक नीति में बुनियादी बदलाव करने होंगे। पड़ोसी देशों के साथ शांति बनाए रखना और अपनी धरती का इस्तेमाल किसी के खिलाफ न होने देना ही एकमात्र रास्ता है। दिखावटी एनकाउंटर हेडलाइंस तो बना सकते हैं, लेकिन देश को सुरक्षित नहीं बना सकते। अब समय है कि पाकिस्तान अपनी गलतियों से सीखे और एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह व्यवहार करे।